Ancestral Property Rights in India: भारत में Ancestral Property Rights in India को लेकर विवाद सबसे आम कानूनी मामलों में से एक है। हालांकि किसी भी कानून में “पैतृक संपत्ति” की परिभाषा लिखित रूप से मौजूद नहीं है, लेकिन आसान शब्दों में इसका मतलब ऐसी संपत्ति से है जो चार पीढ़ियों तक बिना बंटवारे के चली आती है – परदादा से दादा, फिर पिता और उसके बाद संतान तक।
अगर संपत्ति उपहार, वसीयत या खुद की कमाई से मिली है, तो उसे पैतृक संपत्ति नहीं माना जाएगा। केवल वही संपत्ति, जो बिना वसीयत (Intestate Succession) के चार पीढ़ियों से एक पीड़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती आ रही हो , पैतृक सम्पती कहलाती है।
आदिवासी महिला का पैतृक संपत्ति में अधिकार
Ancestral Property Rights in India: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में साफ किया कि अगर कानून में स्पष्ट मनाही न हो, तो आदिवासी महिला को भी पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक मिलेगा। अदालत ने कहा कि महिला को उसका हिस्सा न देना लैंगिक भेदभाव (Gender Discrimination) को बढ़ावा देगा। इसलिए जब तक कोई पुख्ता सबूत विपरीत प्रथा का न मिले, महिला अपने पिता की संपत्ति में बराबर की हकदार है।
संयुक्त परिवार की संपत्ति में हिस्सा मांगने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट 1882 की धारा 3 पर विचार करते हुए कहा कि अगर Ancestral Property Rights in India में अगर पैतृक संपत्ति बेची गई है तो मुकदमा समय-सीमा के अंदर दायर होना चाहिए। वादी ने यह दलील दी कि उन्हें रजिस्टर्ड सेल डीड की जानकारी बाद में हुई, लेकिन कोर्ट ने पाया कि यह तथ्य छिपाए गए। यानी जानकारी छिपाकर देर से मुकदमा दायर करना न्यायसंगत नहीं है।
उत्तराधिकार से मिली संपत्ति क्या पैतृक है?
एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि मां या बहन से मिली संपत्ति (Self-acquired by succession) पैतृक संपत्ति में शामिल नहीं होगी। ऐसी संपत्ति व्यक्तिगत ही मानी जाएगी और उसे जबरदस्ती संयुक्त परिवार की पैतृक संपत्ति में नहीं जोड़ा जा सकता।
मुकदमे के दौरान याचिका में बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पैतृक संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा मुकदमा चल रहा है, तो ट्रायल शुरू होने के बाद याचिका में ऐसा संशोधन नहीं किया जा सकता जिससे मुकदमे की पूरी की पूरी रूपरेखा ही बदल जाए। कोर्ट ने सिविल प्रोसीजर कोड की धारा 6 नियम 17 के प्रावधान को लागू किया और कहा कि बिना किसी ठोस वजह के कोई भी और किसी भी प्रकार का संशोधन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
बेटियों का जन्म से पैतृक संपत्ति पर अधिकार
2020 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच (Arun Mishra, SA Nazeer और MR Shah) ने बड़ा फैसला दिया कि बेटी को जन्म से ही पैतृक संपत्ति पर अधिकार मिलता है, भले ही उसके पिता की मृत्यु 2005 के संशोधन (Hindu Succession Amendment Act, 2005) से पहले ही क्यों न हो गई हो। अदालत ने कहा कि बेटी को भी बेटे की तरह समान अधिकार और जिम्मेदारी मिलेगी।
Settlement Deed और बेटियों का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा कि बेटियां हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के बाद पैतृक संपत्ति की बराबर की हिस्सेदार हैं। अदालत ने भाई-बहनों के बीच हुआ एक समझौता रद्द कर दिया क्योंकि उसमें सभी की सहमति शामिल नहीं थी। कोर्ट ने आदेश दिया कि हर बेटी को बराबरी का हिस्सा मिलेगा, चाहे संपत्ति पैतृक हो या स्वयं अर्जित।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 और महिलाओं का अधिकार
कोर्ट ने माना कि महिला को पैतृक संपत्ति में तभी अधिकार मिलेगा जब वह वास्तविक रूप से संपत्ति की कब्जेदार हो। अगर महिला कभी उस संपत्ति की मालिकाना हकदार नहीं रही और वह केवल बेटे व पोते को दी गई है, तो ऐसी स्थिति में विधवा महिला को उस संपत्ति पर अधिकार नहीं मिलेगा।
अवैध विवाह से जन्मे बच्चे का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवैध विवाह से जन्मे बच्चे को माता-पिता की व्यक्तिगत (Self-acquired) संपत्ति में अधिकार मिलेगा, लेकिन वह संयुक्त पैतृक संपत्ति (Hindu Joint Family Property) का हकदार नहीं होगा। अदालत ने माना कि बच्चे को माता-पिता की गलती की सज़ा नहीं दी जा सकती, लेकिन कानून उसे केवल व्यक्तिगत संपत्ति तक ही सीमित अधिकार देता है।
उत्तराधिकार का केवल अनुमान कोई अधिकार नहीं देता
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा कि यदि कोई व्यक्ति भविष्य में उत्तराधिकार मिलने की उम्मीद में संपत्ति ट्रांसफर करता है, तो ऐसा ट्रांसफर अमान्य होगा। यानी सिर्फ उत्तराधिकारी होने की संभावना से कोई वैध अधिकार पैदा नहीं होता।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले बताते हैं कि भारत में पैतृक संपत्ति (Ancestral Property Rights) से जुड़े विवादों को लेकर कानून लगातार स्पष्टता ला रहा है। बेटियों को बराबर हक मिलना, महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करना और संपत्ति के वास्तविक स्वरूप को पहचानना – ये सब पारिवारिक न्याय और समानता की दिशा में अहम कदम हैं।
FAQ – पैतृक संपत्ति और सुप्रीम कोर्ट के अहम सवाल
क्या विवाहित बेटी को पैतृक संपत्ति में हिस्सा मिलता है?
हाँ, हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के बाद, विवाहित बेटी को भी बेटों की तरह पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक है। पिता जीवित हों या नहीं, बेटी को हिस्सा मिलेगा।
अगर पिता ने वसीयत में बेटी का नाम नहीं लिखा तो क्या होगा?
अगर संपत्ति पैतृक है तो वसीयत का असर केवल पिता के हिस्से तक ही होगा। बाकी संपत्ति में बेटी को बराबरी का अधिकार मिलेगा।
अवैध विवाह से जन्मे बच्चे को पैतृक संपत्ति में हक मिलता है या नहीं?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे बच्चों को केवल माता-पिता की व्यक्तिगत (Self-acquired) संपत्ति में अधिकार होगा, लेकिन पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलेगा।
अगर संपत्ति का पहले ही बंटवारा हो चुका हो तो क्या दोबारा दावा किया जा सकता है?
हाँ, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अनुसार महिला को वही अधिकार मिलेगा, जिस संपत्ति पर उसका कब्जा हो।